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Shree Ram Lala Ka Janm With Shree Ram Dhun
Anup Jalota
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🇮🇳 Hindi · Original
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Original
Translation
Bilingual
कथा के आरंभ में माँ शारदा और गणपति को नमन करने के साथ ही
महाकवि संत तुलसीदास और ऋषि वाल्मीकि का स्मरण किया गया है
आरंभ में कुछ दोहे प्रस्तुत किए गए हैं
इनमें प्रभा ठाकुर जी ने अपने मन के भावों को
बड़ी आस्था और विनम्रता के साथ प्रकट किया है
तो सुनिए
राम रामायण मैं लिखूँ, राम ने दिया विचार
राम की कथा समुद्र-सी, लिखूँ कथा का सार
वाल्मीकि-तुलसी हुए ज्ञानी संत समान
पाकर इनसे प्रेरणा करूँ राम गुणगान
ज्ञान कहाँ इतना मुझे, करूँ राम गुणगान
भूल कहीं रह जाए तो क्षमा करें, श्रीराम
लव-कुश ने गाया जिसे, नगर अयोध्या धाम
वही कथा दोहराऊँ मैं, लेकर राम का नाम
विष्णुलोक में देवता करते करुण पुकार
संत दुखी हैं, लो प्रभु धरती पर अवतार
विकल हुई जननी धरा, बढ़ रहा अत्याचार
सागर त्यागो, देव, अब हरो धरा का भार
हरो धरा का भार
धरती माँ का हाहाकार और देवताओं की पुकार सुनकर
क्षीरसागर में ध्यानलीन भगवान विष्णु ने अपने नेत्र खोले
वे समझ गए कि पृथ्वी पर पापों की अति हो गई है
उनके रचे संसार में अब उनके अवतरण का समय हो गया है
तब अयोध्या नगरी के प्रतापी एवं न्यायप्रिय नरेश
राजा दशरथ के घर में जन्म लेते हैं श्रीराम
श्रीराम की बाल लीला का दर्शन करें
(बोलो श्री राम लला की जय, जय हो राम लला की जय)
विष्णुलोक से उतरे राम, भोले शंकर भजते राम
महालक्ष्मी करें प्रणाम, नारद बोले जय श्रीराम
(नारद बोले जय श्रीराम) जय श्रीराम!
रघुकुल में जन्मे श्रीराम, झूले में सजते श्रीराम
दशरथ के घर हँसते राम, ठुमक-ठुमक कर चलते राम
(ठुमक-ठुमक कर चलते राम)
नीलगगन से निर्मल राम, मुख की शोभा ललित ललाम
दुखियों के सुखकारी राम, त्रेता के अवतारी राम
(त्रेता के अवतारी राम)
राम के हाथों मिले प्रसाद, सोचे काकभुशुण्डि काग
धन्य भाग हुए दर्शन राम, कागा निकट बुलाएँ राम
(कागा निकट बुलाएँ राम)
कैकयी और सुमित्रा मात बार-बार दें आशीर्वाद
कौशल्या का जीवन राम, चारण देव करें गुणगान
(चारण देव करें गुणगान)
गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल धाम, आयुध-शिक्षा पाएँ राम
साथ में तीनों भ्रात सुजान, वेद-उपनिषद पढ़ते राम
(वेद-उपनिषद पढ़ते राम)
अवध के प्राण प्यारे राम, संतों के रखवारे राम
दशरथ हैं बलिहारी राम, गुरु वशिष्ठ सुखकारी राम
(गुरु वशिष्ठ सुखकारी राम)
लटपटाए, गिर कर उठे, भागे चारों ओर
आँगन में सुत खेलते, दशरथ खड़े विभोर
चंद्रकला-से बढ़ रहे भरत, लखन, रघुनाथ
तीनों माताएँ मगन, खेले चारों भ्रात
राम का जो वर्णन करें, शब्द नहीं हैं पास
"राम की छवि है राम-सी," कह गए तुलसीदास
कह गए तुलसीदास
राम-राम, जय राम-राम, जय राम-राम, जय-जय श्रीराम
राम-नाम भज, राम-राम भज, राम-नाम भज सीताराम
(राम-राम, जय राम-राम, जय राम-राम, जय-जय श्रीराम)
(राम-नाम भज, राम-राम भज, राम-नाम भज सीताराम)
राम ही वंदन, राम ही दर्शन, राम ही पूजा, राम प्रणाम
राम नाम की फेर सुमिरनी, राम ही तीर्थ चारों धाम
तुझ में भी है, मुझ में भी है, हर प्राणी के घट में राम
प्रेम से अपना ले तू सबको, तुझको अपनाएँगे राम
राम ही तुलसी, राम ही चंदन, राम नाम जीवन का सार
राम भजो मन, राम मिलेंगे, राम हरेंगे कष्ट अपार
जीवन दुख है, सुख भी दुख है, मन में अगर नहीं है राम
राम पुण्य हैं, राम पूर्ण हैं, जग के जगदीश्वर हैं राम