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Isko Bhi Apnata Chal, Usko Bhi Apnata Chal
Mohammed Rafi
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🇮🇳 Hindi · Original
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Original
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Bilingual
इसको भी अपनाता चल, उसको भी अपनाता चल
राही हैं सब एक डगर के, सब पर प्यार लुटाता चल
इसको भी अपनाता चल...
इधर कफ़न तक नहीं लाश पर, उधर नुमाइश रेशम की
यहाँ स्वयंवर करे चाँदनी, वहाँ ना रात कटे ग़म की
धरती कंकर-पत्थर मारे, अंबर उगले अंगारे
कोई पूछे बात ना इस बग़िया में दुखिया शबनम की
सुख की उम्र बढ़ाता चल, दुख को कफ़न ओढ़ाता चल
मिले जहाँ भी महल, उसे कुटिया के पास बुलाता चल
इसको भी अपनाता चल...
बिका-बिकी सब ओर मची है आने और दो आनों पर
अस्मत बिके दोराहों पर तो प्यार बिके दूकानों पर
डगर-डगर पर मंदिर-मस्जिद, क़दम-क़दम पर गुरुद्वारे
भगवानों की बस्ती में है ज़ुल्म बहुत इंसानों पर
खिड़की हर खुलवाता चल, साँकल हर कटवाता चल
इस पर भी रोशनी ना हो तो दिल का दिया जलाता चल
इसको भी अपनाता चल, उसको भी अपनाता चल
राही हैं सब एक डगर के, सब पर प्यार लुटाता चल
इसको भी अपनाता चल...
हृदय-हृदय के बीच खाइयाँ, लहू बिछा मैदानों में
घूम रहे हैं युद्ध सड़क पर, शांति छिपी शमशानों में
ज़ंजीरें कट गईं, मगर आज़ाद नहीं इंसान अभी
दुनिया-भर की ख़ुशी क़ैद है चाँदी जड़े मकानों में
तट-तट रास रचाता चल, पनघट-पनघट गाता चल
प्यासा है हर प्राण नयन का, गंगा जल छलकाता चल
इसको भी अपनाता चल...
नयन-नयन तरसे सपनों को, आँचल तरसे फूलों को
आँगन तरसे त्योहारों को, गलियाँ तरसें झूलों को
किसी होंठ पर बजे ना बंसी, किसी हाथ में बीन नहीं
उमर समुंदर की दे डाली किस ने चंद बगुलों को
सोई किरण जगाता चल, रूठी सुबहें मनाता चल
प्यार नक़ाबों में ना बंद हो, हर घूँघट खुलवाता चल
इसको भी अपनाता चल, उसको भी अपनाता चल