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Chaman Mein Subh Ye
Shishir Parkhie
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🇮🇳 Hindi · Original
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चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
बहार-ए-बाग़ गो यूँ ही रही लेकिन किधर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
अरक़ की बूँद उस की ज़ुल्फ़ से रुख़्सार पर टपकी
अरक़ की बूँद उस की ज़ुल्फ़ से रुख़्सार पर टपकी
तअज्जुब की है जागह ये पड़ी ख़ुर्शीद पर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
करे है कुछ से कुछ तासीर-ए-सोहबत साफ़ तबओं की
करे है कुछ से कुछ तासीर-ए-सोहबत साफ़ तबओं की
करे है कुछ से कुछ तासीर-ए-सोहबत साफ़ तबओं की
हुई आतिश से गुल के बैठते रश्क-ए-शरर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
नहीं अस्बाब कुछ लाज़िम सुबुकसारों के उठने को
नहीं अस्बाब कुछ लाज़िम सुबुकसारों के उठने को
गई उड़ देखते अपने बग़ैर-अज़-बाल-ओ-पर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
ना समझा, दर्द, हम ने भेद याँ की शादी-ओ-ग़म का
ना समझा, दर्द, हम ने भेद याँ की शादी-ओ-ग़म का
ना समझा, दर्द, हम ने भेद याँ की शादी-ओ-ग़म का
सहर ख़ंदाँ है क्यूँ? रोती है किस को याद कर शबनम?
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम
बहार-ए-बाग़ गो यूँ ही रही लेकिन किधर शबनम
चमन में सुबह ये कहती थी होकर चश्म-ए-तर शबनम