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Kashi Vishwanath Mahima Kashi Ke Niwasi Kre Abhimaan Shiv Ji Pe
Bhupendra Thakur
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🇮🇳 Hindi · Original
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Bilingual
काशी के निवासी करें अभिमान शिव जी पे
पाते हैं अभय दान अभयकर से
प्रलय के समय भी डूबेगी न काशी
हमें आश्वासन मिला है ये प्रलयंकर से
शिव और काशी पर्याय एक-दूसरे के
काशी का अटूट नाता भोले शंकर से
काशी आके शिव को न ढूँढना पड़ेगा
पता उनका मिलेगा तुम्हें कंकर-कंकर से
विश्वनाथ सदाशिव भैरवों में शिव रूप
शिव का ही रुद्र रूप वीर हनुमान है
मंदिर के द्वारे पे विराजमान धुंडीराज
गणपति शिव की औरस संतान है
शिव के निकट राजे शिवमय पार्वती
दोनों ही जगत के लिए वरदान हैं
द्वादश ज्योतिर्लिंग देते हैं काशी को ज्योति
सर्वेश्वर यहाँ सर्वस्थान हैं
पंचकोशी, पंचतीर्थ, परिक्रमा, वंदना
पंच महादेव का दर्श सुखकारी है
मणिकर्णिका से ये परिक्रमा आरंभ होती
चक्र पुष्कर्णी की महिमा भारी है
तारक मंत्र यहाँ देते हैं शिव पार्वती
भक्तों की गति इस मंत्र ने सुधारी है
आदिशिव, आदिशक्ति, मातेश्वरी पार्वती
हमको भी मुक्ति दे, ये विनती हमारी है
ब्रह्माजी का एक शीश काट के सदाशिव
दोषमुक्त होने जाने कहाँ-कहाँ भटके
जहाँ भी वो पहुँचे, कपाल ने न पीछा छोड़ा
रहा वो तो शिवजी के हाथ से ही सट के
यहीं है आनंदवन, यहीं है माधवपुरी
पृथ्वी पे होते हुए पृथ्वी से हट के
यहीं दोषमुक्त हुए मुक्तेश्वर शिव और
विश्वनाथ रह गए काशी में सिमट के
वरुणा अस्सी के संगम पे वाराणसी
विश्वेश्वर शिव की धरा पे राजधानी है
इसे नगरी है पुराणों में द्वादश नाम
गंगा की लहरों में जिनकी कहानी है
संस्कृति, साहित्य, संगीत का मिलन यहाँ
नगरी वाराणसी पुराणों से पुरानी है
भक्तों से अधिक देवी-देवता विराजे
यहाँ शिव जी के संग पार्वती भवानी है
मातृहीन, पितृहीन, गुणहीन, धनहीन
देहहीन, उदासीन विपिन विहारी है
शीशगंग, भालचंद्र, नेत्रलाल, कंठव्याल
भस्म-युक्त, नग्न-तन, जटा-जूटधारी है
भूतेश्वर, नागेश्वर, डमरू, त्रिशूल धर
अशुचि का घर, बैल उसकी सवारी है
"सत्यम् शिवम् सुंदरम्" उसे कहे वेद
कन्या का तुम्हारे, वही शिव अधिकारी है
भक्तों के भंडारे भरे भोले भंडारी शिव
अन्नपूर्णा कोष यहाँ अन्न के लुटाती है
दुर्गति नाशिनी दुर्गा माता है यहाँ
हर विपदा से वाराणसी को बचाती है
चैत्र नवरात्रि में पूजन होता गौरी का
शरद में नवदुर्गा ये पूजी जाती है
विश्वनाथ धाम में झलक चारों धाम की है
पूरी यह समस्त शोभा काशी की आगे बढ़ाती है
विश्वेश्वर, ओंकार और केदार इन
तीन खंडों में काशी शिव जी ने बाँटी है
नगरी ये शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई
इंद्रपुरी भी काशी नगरी से नाटी है
जल नहीं, गंगा जी में अमृत प्रवाहित है
शिव जी की सुरभि से चंदन ये माटी है
महिमा महान उस भूमि का बखान कौन
अपने निवास को जो शिव जी ने छाँटी है
गंगा सागर को जाने वाली गंगा मैया
उत्तरवाहिनी हुई काशी में आके
जन्मों के पाप-शाप, अभिशाप मिट जाए
चंद्राकार वैष्णवी का दर्शन पाके
निर्मल धवल जल, चौड़ा-चौड़ा पाट यहाँ
८४ हैं घाट ऋषिजनह सुता के
लख ८४ योनियों से छुटकारा मिले
एक बार गंगा जी में डुबकी लगाने से
५६ विनायक जुटाते हैं छप्पन-भोग
अष्ट भैरव अष्ट रक्षक हैं काशी के
पूरब में वेदव्यास, रामेश्वर पश्चिम में
उत्तर-दक्षिण घर शिव अविनाशी के
एक विष्णु त्रिभुवन पालते हैं और यहाँ
दाता हैं २४ विष्णु यश-धन राशि के
मार्कण्ड महादेव शूलटंकेश्वर
काम करे पूर्ण शिव दर्शनाभिलाषी के