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Zareen
Mark Bhatia
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🇮🇳 Hindi · Original
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Lyrics
Original
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Bilingual
मैं चीखे मार के बोलता कौन से तू देखो
मैंने दिन दिन गिने तुम दीवार को तो देखो
कालक लगी पड़ी मेरे हाल को तराशो
कोई हकीम मिले तो मेरे इलाज को तो देखो
फिर से लौट आया तो मज्जाल को तो देखो
क्या फिर से लौट जाऊं तुमके वाड़ को तो देखो
शायद आका कैसे मेरे सर पे चढ़ा भूत
भूत को मत देखो बस पिशाच को ही देखो
मेरे खून की उल्टी क्यों तेरे खून से मिलती है?
मेरे खून की उल्टी क्यों अब ज़मीन में मिल रही है?
तू सोना चांदी मेरा तू ज़रीन से मिलती है
मैंने मोह माया त्यागी मेरी जग से मुक्ति है
फिर एक अरसे बाद आंसू, फिर खोला बंद तराजू
फिर से रोज़ा रख के बैठा पर मैं पढ़ता नहीं नमाज हूँ
काफिर पापी का एहसास हूँ, भूला हुआ एहसान हूँ
करी गुस्ताखी थी मैंने, मैं खुद ही खुद हैरान हूँ
पर नहीं मेरा भी गुजारा, मैंने मुड़ के फिर पुकारा
गुजारिशें करी काफी के बुरा हर नजारा
हज़ारों लाखों की तादाद में भरा ज़माना
ज़माने में लोगों की कमी नहीं ना कोई घाटा
पर मैं किसी और का समझ पाऊँगा नहीं इशारा, इशारा, इशारा
घड़ी का काम ही घूमना घूमती रहेगी
वो कहीं अटक गई तो बात ही अलग है
रेत सा स्वभाव तेरा छूटती रहेगी
तू कहीं टेख गई तो साफ-साफ अनर्थ है
देवों में खुदा नहीं क्योंकि उन्हें पलटा वक्त है
हारों को जीतों को दर्दों को पहनूँ मैं हक से
एक नज़र मार ये पानी नहीं ये अश्क है
अगर सब नष्ट है, तुझे मालूम होना है ज़रूरी
के असलियत में कौन हूँ मैं?
तुझे मालूम होना है ज़रूरी
के असलियत में कौन हूँ मैं?
तुझे मालूम होना है ज़रूरी
के असलियत में कौन हूँ मैं?
असलियत में कौन हूँ मैं?
असलियत में कौन हूँ मैं?