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Shiv Tandav Stotram (Hindi Version)
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महादेव महादेव महादेव
आज आपको सुनाने जा रहा हूँ
रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र
शुद्ध हिंदी में
उनके जटा से बहती है गंगाधारा
गले में नागों की टाले माला
और डमरू से डम डम करके लाशी
तांडव नर्त्य से भूत संभाला
हर सुशोभित जटा से गंगा माता
पाताल भू क्या ब्रह्माण्ड संभाला
और सर पे विराजे है स्वयं चंद्र
जो सुशोभित आभूषण जम जमाता
सारे जहाँ में जहाँ भी कदापि ब्रह्माण्ड में कण कण सदा शिव
माता पार्वती संग में धरा भी संभाली
चक्षु से सारी आपदा भी है टाली
नित्र से क्रोध में भू ही हिला दे
करके तांडव जो मच्छु दिखा दे
काले के काल को समक्ष नचा दे
महाकाल जब दृष्टि दिखा दे
कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारम भुजगेंद्रहारम
सदावसंतम हृदयारविंदे भवम भवानी सहितं नमामि
भूतनाथ जब क्रोध में आके राख रगड़ते हैं
तो फिर धम धम करती सृष्टि सारी तांडव करते हैं
तो फिर देव असुर भी भय में आकर साथ में चलते हैं
मेरे महाकाल जब यम को हराके काल को हरते हैं
नागों की मणि है मुकुट में और जटा भी सर्प से युक्त है
त्रिलोक से पुष्प जो गिरते हैं वो हरि के शीश वियुक्त हैं
और उलझी जटा जो खोल दे विकराल रूप वो रुद्र है
शमशान की राख से अंग रगड़ के समक्ष उनके फिर कौन है?
आग नहीं निकले मस्तक से वो विष भी करके रक्षक है
मृत्यु को जीतने वाले मेरे महाकाल संरक्षक हैं
संहार करते जो चक्षु से, विनाश करते जो चक्षु से
विध्वंस करते जो चक्षु से, प्रलय हिलाते जो चक्षु से
तांडव नर्त्य करते तो फिर देव असुर भी डरते
वो विशाल रूप जो धरते जो ब्रह्माण्ड में दूजा ना जग में
वो विष को कंठ में रख ले जो वीरभद्र है जग में जो
शीश को काटते धरते जो दक्ष के प्राण को हर ले वो महादेव है
पैरों में कामदेव है, शांत वो आदिदेव है, विकराल वो रुद्रदेव है
और शंभु पिनाकी अविश्वनाथ जो नर्त्य के देवता नटराज वो
भोले विश्व में विश्वनाथ वो पशुओं के प्रिय जो पशुपतिनाथ वो
यक्षस्वरूपाय जटाधाराय पिनाकहस्ताय सनातनाय
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकराय नमः शिव
सर्वमुक्त शिव सत्य है, शिव समर्थ शिव कृत्य है
शिव विनाश शिव व्यक्त है, संसार ही शिव अधिपत्य है
शिव ही पूर्ण शिव अर्ध है, शिव विजयकर्ता कृत्य है
शिव संसार का अर्थ है, शिव स्वामी शिव लक्ष्य है
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिपर्धनम्
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिपर्धनम्
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
काल मन जो खो करे जो कर्म करे चंदा का
काल उसका क्या बिगड़े जो भक्त हो महाकाल का