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LEKIN

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Lyrics

मैं रोज सोचूं दिल की सुनूं या फिर करूं जो भी सही मुझे लगता यहां पर मैं जैसे एक रास्ते पे चल रहा, ज़िंदगी लेके चली जा रही जहां पर ये मंजिल अब दूर भी लगे, दिल जूर भी लगे आसानियां कहां पर? हम सीखे सब सीने में रखना, तभी आए कुछ ना कभी भी जबां पर मैं किसी से अब लड़ता नहीं हूं, पर ये भी नहीं कि लड़ ना ही सकता मैं साथ लेके चलता हूं सबको, तो तेरे लिए क्या कुछ कर नहीं सकता? ये रस्म और रवाज मेरे बस में ना, मैं रिश्ते पकड़ नहीं सकता तू झूठ बोले रात तू सकूं में थी, क्या मैं चेहरे पढ़ नहीं सकता? तुझे देख अपने आप को देखता, बह की हुई रात में शराब को देखता मैं तुझमें फिर ऐसे एक अज़ाब को देखता , जैसे गुनहगार शख्स हिसाब को देखता कांटों में लिपटे एक गुलाब को देखता, भटका हुआ मेहताब को देखता तेरी बातों में मेरी ये शामें गुजरे, सोए बिना कैसे इस ख्वाब को देखता? तो लो हरमान आए, और बड़े परेशान आए अब तेरे शहर चक्कर लगा है, लेकिन बन के अंजान आए हम तो उसे दिल की बातें करते-करते अक्सर गुमान आए जो तुम घर बनके मेहमान आए, तो जान मेरी जान में भी जान आए क्या तुम भी कभी बैठे-बैठे मेरे बारे यूं ही जो भी चाहे दिल में उल्टा-सीधा सोचती हो क्या तुम भी कभी-कभी कुछ कहने को चाहो पर बेवजह खुद को यूं टोकती हो क्या तुम भी इसी हाल में हो, या तुम भी बेहाल सी हो तुम समझ में ना आती हो, तुम ऐसे सवाल सी हो वाओ मैं तेरे लिए गाने लिखूं, घुमाने लिखूं, अफसाने लिखूं अब जो तू लिखने का कह दे, तो भैंट सब तेरे सिरहाने लिखूं मैं तुझे कभी अपना लिखूं, कभी सपना लिखूं, कई बहाने लिखूं तुझे सोच पीने का सोचूं, क्या तुझे मेखाने लिखूं? ये कला मुझे बोझ लग रही थी, ये कला मेरी दोस्त बन गई है जो रातें मुझे काटने को दौड़ती, वो रातें अब जैसे एक मोज बन गई है अब मेरी कैसी सोच बन गई है, कि तू ही मेरी खोज बन गई है कि अब तुझे लिखते रहना, ये आदतें अब रोज बन गई है अब मेरे नाम किनारे लगते, ये काम मुझे सारे तुम्हारे लगते लोग ढूंढे मुझे कैसे मेरे घर तक पहुं चे, मेरे पीछे कोई खुफिया इदारे लगते तू बैठी रोज अक्सर शाम में थक दी जैसे, घर को कुछ तेरे किनारे लगते ये लम्हे तुझपे भी भारी जैसे, तुमने भी दर्द में गुजारे लगते, वाओ तो लो हरमान आए, और बड़े परेशान आए अब तेरे शहर चक्कर लगा है, लेकिन बन के अंजान आए हम तो उसे दिल की बातें करते-करते अक्सर गुमान आए जो तुम घर बनके मेहमान आए, तो जान मेरी जान में भी जान आए क्या तुम भी कभी बैठे-बैठे मेरे बारे यूं ही जो भी चाहे दिल में उल्टा-सीधा सोचती हो क्या तुम भी कभी-कभी कुछ कहने को चाहो पर बेवजह खुद को यूं टोकती हो क्या तुम भी इसी हाल में हो, या तुम भी बेहाल सी हो तुम समझ में ना आती हो, तुम ऐसे सवाल सी हो वाओ