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Kabhi Aah Lab Pe
Ghulam Ali
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🇮🇳 Hindi · Original
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कभी आह लब पे मचल गई
कभी अश्क़ आँख से ढल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई
मैं ख़याल-ओ-ख़ाब की महफ़िलें
न ब-कद्र-ए-शौक़ सजा सका
मैं ख़याल-ओ-ख़ाब की महफ़िलें
न ब-कद्र-ए-शौक़ सजा सका
तेरी इक नज़र के साथ ही
मेरे सब इरादे बदल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई
कभी रंग में कभी रूप में
कभी छाओं में कभी धुप में
कभी रंग में कभी रूप में
कभी छाओं में कभी धुप में
कहीं आफ़ताब-ए-नज़र हैं वो
कहीं महताब में ढल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई
जो फ़ना हुए ग़म-ए-इश्क़ में
उन्हें ज़िंदगी का न ग़म हुआ
जो फ़ना हुए ग़म-ए-इश्क़ में
उन्हें ज़िंदगी का न ग़म हुआ
जो न अपनी आग में जल सके
वो पराई आग में जल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई
था उन्हें भी मेरी तरह जुनूँ
तो फिर उनमें मुझमें ये फ़र्क क्यूँ?
था उन्हें भी मेरी तरह जुनूँ
तो फिर उनमें मुझमें ये फ़र्क क्यूँ?
मैं गरिफ़्त-ए-ग़म से न बच सका
वो हुदूद-ए-ग़म से निकल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई
कभी अश्क़ आँख से ढल गए
ये तुम्हारे ग़म के चराग़ हैं
कभी बुझ गए कभी जल गए
कभी आह लब पे मचल गई