Musafir
Satwik Kumar
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तेरी मेरी बातें सारी
भूल गए सब दुनियादारी
आंखें मेरी ये राज़ कहती हैं
हो हर पल साथ तू मेरे
मैं हूँ तेरे आगे पीछे
धड़कन भी तेरा नाम लेती है
मुसाफ़िर हूँ, ढूंढ-ढूंढ के राहें
थक गया हूँ अब मैं
बाहें मुझे दिखे जहां भी तेरी
बस जाऊंगा अब मैं
मुसाफ़िर हूँ, ढूंढ-ढूंढ के राहें
थक गया हूँ अब मैं
बाहें मुझे दिखे जहां भी तेरी
बस जाऊंगा अब मैं
मिलके तुझे जाना
मन मेरा था पागल
मेरे हर सपने में
तू ही रहा है
सपनों के उस जहां में
तारों के बीच कहीं
तेरा मेरा एक
आशियाना लिखा है
आवाज़ तेरी मुझे गूंज-गूंज के
ऐसे बुलाए
हर एक लफ्ज़ तेरा जाने क्यों
दिल को छू जाए
मुसाफ़िर हूँ, ढूंढ-ढूंढ के राहें
थक गया हूँ अब मैं
बाहें मुझे दिखे जहां भी तेरी
बस जाऊंगा अब मैं
मुसाफ़िर हूँ, ढूंढ-ढूंढ के राहें
थक गया हूँ अब मैं
बाहें मुझे दिखे जहां भी तेरी
बस जाऊंगा अब मैं