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Jan Jan Ke Priye Ram Lakhan Siya Van Ko Jaate Hain

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बिधना तेरे लेख किसी की, समझ ना आते हैं जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ, बिधना तेरे लेख किसी की समझ ना आते हैं।एक राजा के राज दुलारे, वन वन फिरते मारे मारे एक राजा के राज दुलारे वन वन फिरते मारे मारे धुनी होकर रहे करम गति, डरे नहीं काहू के टारे सब के कष्ट मिटाने वाले, कष्ट उठाते हैं जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ, बिधना तेरे लेख किसी की समझ ना आते हैं।उभय बीच सिया सोहति कैसे? ब्रह्मजीव बिच माया जैसे फूलों से चरणों में कांटे, बिधना क्यों दुख दीने ऐसे पद से बहे लहू की धारा, हर चरणों से गंगा जैसे संकट सहज भाव से सहते और मुस्काते हैं जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ, बिधना तेरे लेख किसी की समझ ना आती है जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं जन जन के प्रिय राम, लखन सिय वन को जाते हैं