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Prarambhi Vinati

Susmirata Dawalkar
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प्रारंभी विनती करूं गणपती विद्या दयासागरा अज्ञानत्व हरोनि बुद्धिमती दे आराध्य मोरे श्वरा चिंताक्लेश दरिद्र दुःख अवघे देशांतरा पाठवी हेरंबा गणनायका गजमुखा भक्ता बहु तोषवी नेत्रीं दोन हिरें प्रकाश पसरे अत्यंत तें साजिरे माथा शेंदूर पाझरें वरिवरे दुर्वांकुराचें तुरे माझें चित्त विरे मनोरथ पुरे देखोनि चिंता हरे गोसावी सुत वासुदेव कविरे त्या मोरयाला स्मरे