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Kohra
Sez on the Beat
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🇮🇳 Hindi · Original
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वापस लौट आया था जहाँ से (जहाँ से)
उसी राह पे फिर चल पड़ा हूँ
ऐ, ज़ालिम हसीना
मैं बस तेरे ग़म गिन रहा हूँ
क्या वाक़ई में हल है?
या बस ज़ाया वक़्त कर रहा हूँ?
या मैं पक्का सही हूँ?
या मैं सही में अँधा हो चुका हूँ?
हम सब हैं एक लत में और किसी को कुछ समझ नहीं आता
बस बच रहे हैं दर्द से और चल रहे हैं जब तक हो चल पाना
तू आसमाँ की पंछी है पानी में और तैरना नहीं आता
तो इसमें तेरी क्या ग़लती?
दिल पे चोट है और सर पे बहुत है
पर लड़के sort हैं
बस चाहते मोक्ष हैं
मैं कब से लिख-लिख, दर्द दूर-दूर कर फूट-फूट रोया
बूँद-बूँद जमा ख़ून-ख़ून खौला
कमी महसूस हुई ख़ूब मेरे ख़ून की बस
पर यहाँ भी ढूँढ ली छत
और कटता है चुतिया सब का
अब याद नहीं वो दिन
जब मैं दर्द और इस दूरी को देता था शून्य fucks, हाँ
इन सपनों के नशों में अँधा था, भूला कुछ ज़रूरी बंदा
रईस पर प्यार से कंगाल
लोग पूछते हैं के "दर्द क्यूँ लिखता है?"
क्यूँकि दर्द बाँटता हूँ तो दर्द कम लगता है
मेरे में नहीं है ego तो झूठ नहीं लिखता मैं
तुमसे बात करता हूँ तो दिल भर उठता है
पापों का भर चुका घड़ा, बस लिखता हूँ बड़ा
पर नहीं हूँ हालातों से बड़ा, मैं नहीं हूँ
मैं नहीं हूँ इन रातों से बड़ा
इन साँसों, जज़्बातों से बड़ा
जो निर्भर हैं मुझपे तो पैरों पे खड़ा हूँ ख़ुद के
इन पैरों पे खड़ा हूँ ख़ुद से
अब देखूँ न कभी भी मुड़ के तो चाहे और जितना भी लुढ़ के
हम पहले से ज़्यादा चतुर हैं
छाती में धुआँ ग़ज़ब है तो भी मैं खींचता जाऊँ
भेजे में कोहरा बहुत है, कैसे ये धुँध उठाऊँ
सही इरादे और भूल-चूक, दोनों ही भूल सा रहा हूँ
भेजे में कोहरा बहुत है
यहाँ हो चुके आँखों से अँधे, बस मुझे देखते जाओ
कैसे लगा के मुखौटा मैं रोते हुआ मुस्कराऊँ
छोटे भी देते नहीं साथ हैं, मैं सही में थक चुका हूँ
फँस चुका हूँ, मर रहा हूँ, डर रहा
हमेशा से motto था एक ही कि go work
ज़िंदगी ले class, versus है homework
Versus उन लोगों के जो रखे दो मुँह, यहाँ पे हैं दो सर, oh, yeah
थोड़े से woke और थोड़े से लोफ़र
थोड़ा से लोग और दिए हैं खो पर अब होता है no दर्द
छाती में धुआँ ग़ज़ब है तो भी मैं खींचता जाऊँ
और कब तक दब के जियूँ ये छल-कपट-सी ज़िंदगी
मैं कल सफ़ल नहीं हुआ तो शर्म से मर ना जाऊँ
ये लत कमीनी, कपकपी जो हुई थी कम, वो झट से वापस आयी फिर मैं भी
वापस लौट आया था जहाँ से (जहाँ से)
उसी राह पे फिर चल पड़ा हूँ
ऐ, ज़ालिम हसीना
मैं बस तेरे ग़म गिन रहा हूँ
क्या वाक़ई में हल है?
या बस ज़ाया वक़्त कर रहा हूँ?
या मैं पक्का सही हूँ?
या मैं सही में अँधा हो चुका हूँ?
Sez on the Beat, boy